क्या स्कूल सुरक्षा के लिए बच्चों को ट्रैक कर सकता है? DPDP नियम क्या कहते हैं
भारत का डेटा संरक्षण क़ानून बच्चों की ट्रैकिंग पर रोक लगाता है — लेकिन स्कूलों और उनके ट्रांसपोर्ट प्रदाताओं को सीमित छूट देता है। जानिए क्या अनुमति है, क्या नहीं, और मई 2027 से पहले क्या करना है।

इस पेज पर
संक्षेप में
- भारत का डेटा संरक्षण क़ानून आमतौर पर बच्चों की ट्रैकिंग पर रोक लगाता है, और बच्चे का डेटा इस्तेमाल करने से पहले अभिभावक की सत्यापित सहमति माँगता है।
- DPDP नियम, 2025 एक सीमित छूट देते हैं: स्कूल, और उसका रखा हुआ ट्रांसपोर्ट प्रदाता, सफ़र के दौरान नामांकित बच्चों की लोकेशन उनकी सुरक्षा के लिए ट्रैक कर सकते हैं।
- यह छूट सिर्फ़ ट्रैकिंग के लिए है। सूचना देना, डेटा सुरक्षित रखना, लीक की रिपोर्ट करना और समय पर डेटा मिटाना फिर भी ज़रूरी है, और ये ज़्यादातर ज़िम्मेदारियाँ लगभग मई 2027 से लागू होंगी।
अगर आपका स्कूल बसों में GPS, अभिभावकों के लिए ऐप या गेट पर QR कोड इस्तेमाल करता है, तो आप बच्चों का निजी डेटा संभाल रहे हैं। DPDP नियम आने के बाद से प्रिंसिपल हमसे एक ही सवाल पूछ रहे हैं: क्या स्कूल अब भी सुरक्षा के लिए बच्चों को ट्रैक कर सकता है, या पहले हर अभिभावक की सहमति लेनी होगी?
छोटा जवाब है: हाँ, स्कूल सफ़र के दौरान बच्चों की सुरक्षा के लिए उन्हें ट्रैक कर सकते हैं, लेकिन तय सीमाओं के भीतर। यह गाइड नियम को आसान भाषा में समझाती है, बताती है कि छूट में क्या आता है और क्या नहीं, और समय-सीमा से पहले आपको क्या तैयार करना चाहिए।
ध्यान दें: यह आसान भाषा में दी गई जानकारी है, क़ानूनी सलाह नहीं। अपने स्कूल की ख़ास स्थिति के लिए डेटा संरक्षण के जानकार वकील से बात करें।
एक पैराग्राफ़ में क़ानून
डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट, 2023 तय करता है कि भारत में संस्थाएँ निजी डेटा कैसे इकट्ठा और इस्तेमाल करें। इसके विस्तृत DPDP नियम 14 नवंबर 2025 को अधिसूचित हुए। कुछ नियम तुरंत लागू हो गए, और स्कूलों से जुड़ी ज़्यादातर ज़िम्मेदारियाँ (नियम 3, 5 से 16, 22 और 23) अधिसूचना के अठारह महीने बाद, यानी लगभग मई 2027 से लागू होंगी। इस क़ानून में 18 साल से कम उम्र का हर व्यक्ति बच्चा माना गया है।
बच्चों के लिए दो ख़ास नियम
क़ानून की धारा 9 बच्चों को अतिरिक्त सुरक्षा देती है। स्कूलों के लिए इसके दो हिस्से सबसे अहम हैं:
- अभिभावक की सहमति (धारा 9(1))। बच्चे का निजी डेटा इस्तेमाल करने से पहले संस्था को माता-पिता या क़ानूनी अभिभावक की सत्यापित सहमति लेनी होती है। नियम 10 इसका तरीका बताता है: संस्था को जाँचना होता है कि सहमति देने वाला व्यक्ति सच में वयस्क अभिभावक है, जैसे पहले से मौजूद जानकारी या सरकारी डिजिटल टोकन से।
- ट्रैकिंग पर रोक (धारा 9(3))। संस्था बच्चों को ट्रैक नहीं कर सकती, उनके व्यवहार की निगरानी नहीं कर सकती, और उन्हें लक्ष्य करके विज्ञापन नहीं दिखा सकती।
अगर सिर्फ़ ये दो नियम होते, तो बस की लाइव ट्रैकिंग और गेट पर चेक-इन बहुत मुश्किल हो जाते। इसीलिए नियमों में छूट दी गई है।
स्कूल और स्कूल परिवहन के लिए छूट
DPDP नियमों का नियम 11 और चौथी अनुसूची कुछ संस्थाओं को धारा 9(1) और 9(3) से छूट देते हैं, हर एक सख़्त शर्त के साथ। स्कूलों पर दो प्रविष्टियाँ लागू होती हैं:
| कौन | अलग से सहमति लिए बिना क्या कर सकते हैं |
|---|---|
| शैक्षणिक संस्था | ट्रैकिंग और व्यवहार की निगरानी, लेकिन सिर्फ़ संस्था की शैक्षणिक गतिविधियों के लिए, या उसमें नामांकित बच्चों की सुरक्षा के हित में। |
| शैक्षणिक संस्था, क्रेश या चाइल्ड-केयर सेंटर द्वारा रखा गया ट्रांसपोर्ट प्रदाता | नामांकित बच्चों की लोकेशन ट्रैक करना, सिर्फ़ उनकी सुरक्षा के हित में, संस्था आने-जाने के सफ़र के दौरान। |
व्यवहार में इसका मतलब है कि स्कूल अभिभावकों को बस की लोकेशन दिखा सकता है, बच्चे के चढ़ने-उतरने का समय दर्ज कर सकता है, और बच्चा स्कूल न पहुँचे तो अलर्ट भेज सकता है, क्योंकि यह ट्रैकिंग बच्चे की सुरक्षा के लिए है। स्कूल का ट्रांसपोर्ट पार्टनर भी सफ़र के दौरान यही कर सकता है।
छूट में क्या नहीं आता
स्कूल सबसे ज़्यादा ग़लती यहीं करते हैं। छूट सीमित है:
- यह सिर्फ़ ट्रैकिंग के बारे में है, बाक़ी सब के बारे में नहीं। बच्चों की तस्वीरें सोशल मीडिया पर डालना, किसी मार्केटिंग पार्टनर से डेटा साझा करना, या बच्चों के डेटा के आधार पर अभिभावकों को कुछ बेचना इसमें नहीं आता। इनके लिए सही सहमति अब भी ज़रूरी है।
- यह सुरक्षा के लिए है, सुविधा के लिए नहीं। लोकेशन की हिस्ट्री से बच्चे के व्यवहार को परखना, छात्रों की रैंकिंग करना, या सुरक्षा से असंबंधित किसी काम में लगाना छूट से बाहर है।
- बाक़ी ज़िम्मेदारियाँ बनी रहती हैं। स्कूल अब भी "डेटा फ़िड्यूशियरी" है। उसे साफ़ बताना होगा कि वह क्या और क्यों इकट्ठा करता है, डेटा सुरक्षित रखना होगा, डेटा लीक होने पर रिपोर्ट करनी होगी, और ज़रूरत ख़त्म होने पर डेटा मिटाना होगा।
जुर्माने बड़े हैं। क़ानून में बच्चों से जुड़े प्रावधान तोड़ने पर ₹200 करोड़ तक और उचित सुरक्षा उपायों से डेटा न बचाने पर ₹250 करोड़ तक के जुर्माने का प्रावधान है।
ज़िम्मेदारी किसकी: स्कूल की या ऐप की?
DPDP क़ानून में जो संस्था तय करती है कि डेटा क्यों और कैसे इस्तेमाल होगा, वह डेटा फ़िड्यूशियरी है। बच्चों के परिवहन डेटा के मामले में यह आमतौर पर स्कूल होता है। जो टेक्नोलॉजी कंपनी स्कूल के लिए ट्रैकिंग या हाज़िरी का सिस्टम चलाती है, वह आमतौर पर डेटा प्रोसेसर होती है: वह स्कूल के निर्देश पर डेटा संभालती है।
अभिभावकों के प्रति जवाबदेही स्कूल की ही रहती है। इसलिए वेंडर चुनते समय ये सवाल पूछें:
- डेटा कहाँ रखा जाता है, और वेंडर के अंदर उसे कौन देख सकता है?
- लोकेशन की हिस्ट्री कितने समय तक रखी जाती है, और क्या माँगने पर मिटाई जा सकती है?
- अगर डेटा लीक हो, तो क्या वेंडर आपको तुरंत बताएगा?
- क्या डेटा कभी विज्ञापन के लिए इस्तेमाल होता है या किसी और से साझा होता है? (जवाब "नहीं" होना चाहिए।)
- क्या यह सब एक लिखित समझौते में दर्ज है?
उन स्कूलों के लिए, जो बच्चों के डेटा को गंभीरता से लेते हैं
BOBOK आपके डेटा प्रोसेसर की तरह काम करता है: ट्रैकिंग सिर्फ़ सफ़र और बच्चे की सुरक्षा के लिए होती है, कभी विज्ञापन के लिए नहीं, और हर स्कूल के साथ हमारे समझौते में डेटा रखने, देखने और मिटाने के नियम साफ़ लिखे होते हैं।
मई 2027 से पहले स्कूलों के लिए चेकलिस्ट
- वे सभी जगहें लिखें जहाँ आप बच्चों का डेटा लेते हैं: एडमिशन, परिवहन, हाज़िरी, ID कार्ड, फ़ीस, अभिभावक ऐप।
- हर एक का उद्देश्य लिखें। चिह्नित करें कि कौन-सा सफ़र में सुरक्षा के लिए ट्रैकिंग है और कौन-सा नहीं।
- अभिभावकों के लिए अंग्रेज़ी और स्थानीय भाषा में एक छोटी, आसान सूचना तैयार करें कि आप क्या और क्यों इकट्ठा करते हैं।
- सुरक्षा वाली छूट से बाहर की चीज़ों के लिए, जैसे न्यूज़लेटर या सोशल मीडिया पर तस्वीरें, अभिभावकों की सत्यापित सहमति लें।
- अपने ट्रांसपोर्ट और सॉफ़्टवेयर वेंडरों के साथ डेटा प्रोसेसिंग समझौते करें।
- तय करें कि लोकेशन और हाज़िरी की हिस्ट्री कितने समय तक रखेंगे, और उसके बाद मिटा दें।
- अभिभावकों के डेटा से जुड़े सवालों और शिकायतों के लिए एक व्यक्ति तय करें।
- डेटा लीक होने पर क्या करना है, इसकी एक आसान योजना लिखें, जिसमें यह भी हो कि अभिभावकों और डेटा प्रोटेक्शन बोर्ड को कौन सूचित करेगा।
अभिभावकों के लिए इसका मतलब
अभिभावकों के लिए यह अच्छी ख़बर है। जो स्कूल बस को ट्रैक करता है, उसे यह जानकारी सिर्फ़ बच्चों की सुरक्षा के लिए इस्तेमाल करनी होगी, बताना होगा कि वह क्या इकट्ठा करता है, उसे सुरक्षित रखना होगा, और उससे कुछ बेचना नहीं होगा। अगर आप जानना चाहते हैं कि आपका स्कूल आपके बच्चे के डेटा के साथ क्या करता है, तो पूछना आपका हक़ है। स्कूल बस के बारे में अभिभावकों के सवालों पर हमारी गाइड से शुरुआत कर सकते हैं।
सही तरीके से अपनाए जाएँ, तो DPDP नियम स्कूलों को बच्चों की सुरक्षा से नहीं रोकते। वे बस यह पक्का करते हैं कि सुरक्षा के साधन सुरक्षा के लिए ही रहें।

